श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ,

देवभूमि तीर्थनगरी पावन धाम हलालपुर जिला - बगपत ( उ ० प्र ० )भारत

श्री बाबा मोहन आश्रम का, यह कृष्णतीर्थ बलिहारी । जयकृष्ण०

श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ - वेदव्यास धर्मपीठ, हलालपुर इतिहास

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( सतयुग एवं त्रेता का चमत्कारपुर , द्वापर का हरिलालपुर व कलियुग का हलालपुर )

जन्म और कार्यस्थलः भगवान् वेदव्यास के जन्म और कार्यस्थल के सम्बन्ध में यद्यपि विभिन्न किंवदन्तियां प्रचलित हैं तथापि श्रीमद भगवद , महाभारत और देवीभागवत के अनुसार यमुना के अज्ञात द्वीप को महर्षि वेदव्यास का जन्मस्थान मानकर उनका आश्रम प्रमुखता माता सरस्वती तटवर्ती बदरीवन को ही विद्वानों ने माना है । इस मान्यता का आधार वेदव्यासकृत श्रीमद भगवदादि रचनाएं ही हैं । शश्रीमद भगवदके प्रथम स्कंध में इस बात का प्रबल प्रमाण विद्यमान है कि भगवान वेदव्यास ने अपना साधनारत जीवन माता सरस्वती तट पर ही बिताया और देवर्षि नारद की प्रेरणा से वहीं श्रीमद भगवद की रचना कर आत्मसंतोष प्राप्त किया । यह स्थान कहाँ ओर किस स्थिति में है , इसका परिचय यहां देना असंगत न होगा -
व्यासपुर में माता सरस्वती तट पर व्यासाश्रमः हरियाणा प्रांत के अम्बाला मण्डलवर्ती जगाधरी ( यमुनानगर ) नामक स्थान से लगभग पच्चीस किलोमीटर उत्तर में बिलासपुर नामक समृद्ध गांव है । इसी का प्राचीन नाम व्यासपुर है । राजकीय अभिलेखों के अनुसार यह छ : सौ वर्ष से निरंतर बसा हुआ है । इसी ग्राम के दक्षिण में वेद व्यास सरोवर है , जिसे यहां की जनता परंपरागत रूप में भगवान् वेदव्यास का आश्रमस्थल मानती आ रही है । इस स्थान से लगभग दो फर्लांग दूर द्वादशमासप्रवाहिणी नदी के रूप में ब्रह्म नदी माता सरस्वती के दर्शन होते हैं । इसी व्यासाश्रम अथवा व्यास सरोवर के उत्तर में, एक कोस की दूरी पर तीर्थ राज कपालमोचन तथा ऋणमोचन नामक दो सरोवर हैं , जहाँ प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है । यहाँ से लगभग पच्चीस किलोमीटर उत्तर में आदिबदरी नामक प्राचीनतम देवमंदिर पर्वत शिखर पर विद्यमान है । यही नगाधिराज हिमालय की यात्रा पूर्ण कर ब्रह्मनदी सरस्वती मैदानी क्षेत्र में उतरकर पूर्वोक्त व्यासाश्रम के पार्श्वे में प्रवाहित होती हई कृरुक्षेत्र में पहुंचती है । यहाँ सरस्वती नदी के तट पर ही अगस्त्याश्रम , मदगलाश्रम आदि ऋषियों के स्थान हैं , जहाँ आज भी अनेकानेक साधक तपस्वी साधनारत दिखाई पड़ते हैं । व्यासपुर एवं इस समस्त क्षेत्र की जनता सनातन परम्परा से ही व्यास सरोवर को भगवान् वेदव्यास का आश्रम मानती आ रही है ।
राजकीय अभिलेखों में व्यासाश्रमः आंगल शासन काल के प्रारंभिक अभिलेख ( सन् 1887 - 88 ) , जो भारतीय भू - संरक्षण का आदिम अभिलेख माना जाता है , में स्पष्ट लिखा है की- हिंदू धर्म के सर्वश्रेष्ठ महर्षि, वेदों के संपादक श्री वेदव्यास का आश्रम यही बिलासपुर का दक्षिणदिगस्थ व्यास सरोवर है । इसी व्यास सरोवर के नाम पर यह गाँव पहले व्यासपुर के नाम से बसा था और फिर प्रयोगादिवश बिगड़कर उच्चारण में बिलासपुर हो गया है ।

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पंचमवेद महाभारत को भगवान वेदव्यास जी बोलते हुए तथा गणेश जी लिखते हुए । ( महाभारत युद्ध के तीन वर्ष बाद यह पंचम वेद ( महाभारत ) ८८०० श्लोकों में लिपिबद्ध हुआ जिसको वेदव्यास जी ने अपने पाँचवे शिष्य रोमहर्षण सूत जी को पढ़ाया । यह महाभारत श्रुतियों का सार है । श्रद्धा भक्ति सम्पन्न महात्मा महर्षि वेदव्यास जी के दर्शन आज भी प्राप्त करते हैं । वेद व्यास जी दया , धर्म , ज्ञान एवं तप की परमोज्ज्वल मूर्ति है )

स्कंदपुराण , हिमाद्रिखण्ड , आदिबदरी क्षेत्र महात्म्य में भी व्याससरोवर का स्पष्ट उल्लेख है । कछ लोग उत्तरांचलीय बदरीनारायण धाम की ओर बदरीवन मानते हैं । यद्यपि शास्त्र और लोकमान्यता के अनुसार यह भी बदरीवन ही हैं , परन्तु जहाँ व्यासाश्रम की स्थिति स्वीकार की गई है , वह बदरीवन तो व्याससरोवर का पार्श्ववर्ती क्षेत्र ही है । बिलासपुर के व्यासाश्रम के अतिरिक्त विभिन्न स्थानों में स्थित उनके अनेको आश्रमों में से एक आश्रम का विवरण निम्न प्रकार है

1 . व्यास झील : वेद व्यास धर्म पीठ बाबा मोहन राम मन्दिर की भूमि उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के बदरखा गांव की सीमा के अंदर है । द्वापर युग में यहाँ वेदव्यास जी का आश्रम रहा है वेद व्यास जी को बादरायण कहते हैं इनके नाम पर बादरायण पुर ( उत्तर प्रदेश के जिला बागपत ) जो प्रयोगादिवस बिगड़कर उच्चारण में बदरखा हो गया है । तथा इस स्थान पर महात्मा विदुर ने तपस्या की थी । यह भूमि ऋषियों की तपोभूमि है । इस पावन भूमि पर महाप्रभु श्री तेजबीर सिंह जी को बाबा मोहन राम ने दर्शन देकर मंदिर बनाने की आज्ञा दी तथा इस मंदिर में सभी मनोकामना पूर्ण होगी और बाबा मोहन राम की शक्ति विराजमान रहेगी तथा भगवान श्रीकृष्ण जी ने आशिस् दिया जब तक सृष्टि रहेगी जब तक मेरा आशिस् तुम्हारे परिवार पर बना रहेगा, अन्न और वंश की बेल हरी-भरी रहेगी | महाप्रभु ने इस भूमि को बदरखा गाँव के निवासी श्री ऋषिपाल से खरीदकर यहाँ पर श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ - वेदव्यास धर्म पीठ हलालपुर मन्दिर की नीव व पावन पवित्र अमर ज्योति की स्थापना दिनांक 4 अक्टूबर 2001 तिथि द्वितीय ( दौज ) को रखी थी । सार्वभौम सनातन धर्म महासभा एवं विश्व धर्म ससंद ने 06 - 06 - 2012 को इसका नाम वेदव्यास धर्मपीठ रखा । द्वापर काल में इस स्थान के निकट बहुत बड़ी झील थी , जिसका नाम व्यास झील था । आज उस झील के अंदर खेती होती है । यह स्थान द्वापर काल में बहुत समृद्धशाली था तथा इसके निकट यमुना नदी होने के कारण यह स्थान बहुत बड़ा व्यापारिक स्थल भी रहा है । श्रीकृष्ण जी भगवान ने व्यास झील के किनारे ( व्यास आश्रम में ) विश्राम किया था । उसी समय उन्हें पुत्र रत्न होने की सूचना इसी स्थान पर मिली थी । इसलिए द्वापर काल में इस स्थान का नाम हरिलालपुर पड़ा । सत्युग और त्रेता में इसका नाम चमत्कारपुर रहा है । जो वर्तमान में प्रयोगदिवश बिगाड़कर उच्चारण में हलालपुर हो गया है । भगवान श्रीकृष्ण जी ने इसी व्यास झील में स्नान किया था जिससे वह व्यास झील महातीर्थ बन गई । पुत्र रत्न का समाचार मिलने पर शंकर भगवान इस स्थान पर श्रीकृष्ण जी से मिलने स्वयं आए थे । बताते हैं कि जब शंकर भगवान श्रीकृष्ण जी से मिलने आए तो श्रीकृष्ण जी इसी झील में स्नान कर रहे थे और शेष नाग जी झील में ही मौजद थे । उन्होंने आशिस् दिया था कि कलयुग में यह झील अमृतकुण्ड होगी और इसका जल पीने से अथवा स्नान करने से मनुष्यों के दैहिक , दैविक और भौतिक सभी कष्ट दूर हो जायेंगे । जो व्यक्ति कलयुग में इस स्थान पर मेरी पूजा श्रद्धा भाव के साथ करेगा उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण हो जाएगी । यहाँ भगवान श्रीकृष्ण जी को बाबा मोहन राम के नाम से पुकारते है । इस व्यास झील में बाबा मोहन राम का मंदिर स्तिथ है । भगवान श्रीकृष्ण जी के आशिस् एवं वेद व्यास जी की साधना के कारण यहां माघ और ज्येष्ठ मास में भारी संख्या में श्रद्धालु तपस्या करते हैं तथा इस बाबा मोहनराम मंदिर की महिमा निम्न -प्रकार से है

* . यहाँ नि:संतानो की मनोकामना पूर्ण होती है - इस स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण माता रुकमणी के साथ आये थे और वेद व्यास आश्रम में विश्राम किया था। उन्होंने आशिस् दिया था , जो व्यक्ति इस स्थान पर मेरी ज्योति में घी डाल कर अपनी मनोती मागेगा और पूजा करेगा उनके घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी । इस मन्दिर में पूजा करने के बाद अपनी मनोती के लिया गूलर के पेड़ पर गांठ लगाते हैं और बाबा के आशिस् से सबकी मनोकामना पूर्ण होती हैं। उनके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मनोकामना बाबा पूर्ण करते है। बाबा मोहन राम अंधे को आँख निर्धन को माया और कोढ़ी को काया देता है जिससे बाबा मोहन राम नि:संतानों की गोद को भर देते हैं । मनोकामना पूर्ण होने के बाद इस स्थान पर बाबा जी का भण्डारा किया जाता है और मुण्डन किया जाता है । बाबा जी को दौज में खीर के प्रसाद का भोग लगया जाता है ।

* . मानसिक रोगी ठीक हो जाते हैं - इस स्थान पर जहाँ बाबा मोहन राम जी की पावन पवित्र ज्योति प्रज्वलित है वहाँ पर माथा टेकने से सभी प्रकार के मानसिक रोग दूर हो जाते । है । बाबा मोहन राम की निराकार ज्योति पर माथा टेकते ही नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है तथा रोगी शान्ति का अनुभव करने लगते है |

* . स्थिर लक्ष्मी का वास होना - चमत्कारी बाबा मोहन राम जी की पावन पवित्र ज्योति में घी डालने तथा माथा टेकने पर सभी भक्तजनों के घर स्थिर लक्ष्मी का वास होता है । जो व्यक्ति धर्मबीज व्रत ( तिथि दौज का व्रत ) करता है , उसके घर में लक्ष्मी का वास होता है । जिससे दुःख दरिद्रता दूर हो जाती है एवं कलिकाल बाधा नहीं पहुंचाता ।

* . सोई हुई किस्मत जाग जाती है - बाबा मोहनराम जी के आशिस् के कारण जो लोग पेट के बल लेटकर पावन पवित्र ज्योति के दर्शन करते हैं उनकी सोई हुई किस्मत जाग जाती है । विद्यार्थी को विद्या , धन की इच्छा रखने वाले को धन , पुत्र की इच्छा रखने वाले को पुत्र प्राप्त होता है , आरोग्यता तथा व्यापार में चौमुखी प्रगति होती है ।

* . शारीरिक रोगों का ठीक होना - इस स्थान परअमृत कण्ड का जल पीने से अथवा स्नान करने से सभी शारीरिक रोग स्वतः ही दूर होने लगते हैं ।

* . सभी धर्मों का आस्था केंद्र - इस पावन पवित्र धाम में बाबा मोहन राम की निराकार ज्योति हमेशा ही प्रज्वलित रहती है जिसमें सभी धर्मों के लोग बड़ी आस्था से आकर बाबा के सामने नतमस्तक होकर उनको नमन करते हैं और बडे विश्वास के साथ भक्ति भाव से बाबा को मनाते हैं तथा अपनी सभी मनोकामनाओं के पूर्ण होने का आशिस् प्राप्त करते हैं ।

* . बाबा मोहन राम की गुरु गद्दी *दिव्य शक्तिओ से शोभायमान- इस पावन पवित्र धाम में बाबा मोहन राम जी की दिव्य शक्ति से शोभायमान प्राप्त सिंहासन (गुरु गद्दी ) है । श्री महाप्रभु तेजबीर सिंह जी सिंहासन पर बैठने के बाद जो भक्तजन आशिस् प्राप्त करते है उनकी सभी नोकामना श्री बाबा मोहन राम जी के आशिस् से पूर्ण होती हैं । यह बाबा मोहन राम की चमत्कारी दिव्य शक्ति प्राप्त सिंहासन की महिमा हैं इस धाम पर जो व्यक्ति जिस भाव से आता है बाबा मोहन राम उसकी मनोकामना उसी भाव से पूर्ण करते हैं । बाबा मोहनराम जी सिंहासन पर दिया हआ वचन सत्य कर देते हैं ।

* . ऐतिहासिक श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ - वेदव्यास धर्म पीठ विश्व धर्म संसद , सार्वभौम सनातन धर्म महासभा एवं आयुर्वेद विश्व परिषद द्वारा प्रमाणित ऐतिहासिक यहाँ बाबा मोहन राम आश्रम वेदव्यास धर्म पीठ व कृष्णतीर्थ हैं । समय - समय पर यहाँ पर योगी जन , भक्त जन , संत - महात्मा और तपस्वी दर्शन करने आते हैं तथा प्रत्येक दौज पर यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है ।

* . भगवान श्रीकृष्ण जी की कर्मभूमि - यह स्थान भगवान कृष्ण जी की कर्म भूमि है । द्वापर काल में श्रीकृष्ण भगवान ने यहाँ पर कई बार वेद व्यास झील के किनारे व्यासश्राम में विश्राम किया । महाभारत के समय श्रीकृष्ण जी का पड़ाव यहाँ से लेकर शामली ( श्यामवाली ) तक था । इसी रास्ते से कुरुक्षेत्र ( धर्मक्षेत्र ) जाने के लिए यमना नदी को पार किया था अर्जुन को गीता उपदेश देने एवं महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहीं पर स्थित व्यास झील में स्नान किया था उन्होंने इस स्थान पर अपनी लीला दर्शाई और इस भूमि को आशिस् दिया कि कलियुग का समय आने पर मैं यहाँ प्रकट होऊंगा तथा मेरे भक्त के द्वारा यहाँ मेरे मन्दिर की स्थापना होगी । उस मन्दिर में मेरी शक्ति द्वापर का मोहन और त्रेता का राम , मोहनराम के रूप में हमेशा जाग्रत रहेगी । मैं जिस भक्त को दर्शन दूंगा । वह भक्त मेरे इस स्थल पर मन्दिर बनवाएगा । जब तक सृष्टि रहेगी तब तक मेरे उस भक्त का नाम अमर होगा । उसके परिवार पर पीढ़ी दर पीढ़ी मेरा आशिस् बना रहेगा । उसकी अन्न और वंश की बेल हरी-भरी रहेगी । जो लोग यहाँ पर श्रद्धा भाव से आयेंगे , उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी ।

* . महाप्रभु तेजबीर सिंह जी को बाबा मोहनराम के दर्शन एवं आशिस् श्री कृष्ण भगवान ने अपने दिये हुए वचन के अनुसार महाप्रभु श्री तेजबीर सिंह को बाबा मोहन राम के रूप में अपने दर्शन दिए तथा महाप्रभु को आज्ञा दी कि यहाँ मेरे नाम का मन्दिर बनवाओ । यहाँ पर मेरी शक्ति का पूर्ण वास है । मेरी यह शक्ति दुखियो के दुख दूर करेगी तथा श्री कृष्णा जी ने महाप्रभु को अपना सिंहासन- (गद्दी) के रूप में प्रदान किया और आशिस् दिया कि मेरी कृपा तुम्हारे परिवार पर जब तक सृष्टि रहेगी, तब तक बनी रहेगी । अन्न और वंश की बेल सदा हरी-भरी रहेगी । सिंहासन पर बैठने के बाद तेरा स्वरूप मेरा स्वरूप के सद्र्ष्य हो जायेगा तथा तुम्हारे मुख से जो वचन निकलेगा वह पत्थर की लकीर कर दूगा । प्रत्येक द्वितीया तिथि को यहाँ मेला लगेगा और मेरे नाम का भण्डारा चलता रहेगा । जहा तुमरे चरण पड़ेंगे और मेरे नाम के जय - जय कारे लगेंगे उस घर से दुःख - दरिद्रता और सारे कष्ट दूर हो जायेंगे और वह घर खुशहाल हो जाएगा । इस प्रकार आशिस् देकर बाबा मोहनराम जी इसी स्थान पर इस खोली में विराजमान हो गए ।
* . भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आगरा सर्किल में आने वाला बागपत एतिहासिक है |
यह भूमि महाभारत की कर्म स्थली रही है| श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ - वेदव्यास धर्म पीठ से ३ km दूर है सिनौली में हुए उत्खनन में महाभारत कालीन पुरावशेष प्राप्त होने से इसका महत्‍व बढ़ गया है। इसे देखते हुए भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण ने इस गांव को संरक्षित पुरातत्‍वीय स्‍थल घोषित करने की योजना बनाई। बागपत. जनपद के सिनौली गांव में एक बार फिर से प्राचीन अवशेष मिल रहे है। महाभारत की जमीन सिनौली गांव में एक तरफ जहां महाभारत काल के अवशेष मिल रहे हैं। वहीं राज परिवार के दफन होने के सबूत भी मिले है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान की टीम को खुदाई के दौरान एक प्राचीन दीवार होने के भी संकेत मिले हैं। यहां खुदाई के दौरान मृदभांड, तांबे की तलवार और नरकंकाल मिले है साथ ही प्राचीन शवधान केंद्र और प्राचीन रथ निकले है। इतिहासकारों का कहना है कि खुदाई के दौरान सिनौली की जमीन पर प्राचीन शहर का इतिहास सामने आ सकता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्खनन शाखा व भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला दिल्ली के संयुक्त अभियान के दौरान तीसरे चरण की खुदाई की जा रही है। खुदाई के दौरान अभी तक ताम्र निर्मित तलवार, 16 मृदभांड और एक कंकाल मिले चुके हैं। एक दीवार भी मिली है। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने बताया कि यह दीवार शवाधान (क़ब्रिस्तान )की हो सकती है। जो ईटें निकली है, उनकी लंबाई और चौड़ाई ज्यादा है। यह 4500-5000 साल पुरानी हो सकती हैं।
हो सकता है लाक्षागृह काफी पहले से ही यहां खुदाई की जा रही है। जिसके चलते सिनौली गांव में महाभारत की जमीन होने की वजह से दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। सिनौली के पास में हिंडन व कृष्णा नदी के बीच बरनावा गांव में टीले पर लाक्षागृह एव गुफा भी मौजूद है। पहले भी इसके बारे में दावा किया जा चुका है कि आग लगने के बाद इसी गुफा से पांडव जान बचाकर भागे थे। बरनावा और सिनौली के आस-पास प्राचीन काल की चीजें मिलने का सिलसिला जारी है। इतिहासकारों की माने तो महाभारत काल से यह क्षेत्र जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि पांडवों ने युद्ध से पहले कौरवों से जो गांव मांगा था, वह उन पांच गांवों मे से बागपत भी एक है। *खुदाई के दौरान मिली ये वस्तुएं* इससे पहले सिनौली में 2004-05 में पहली बार खुदाई की गई थी। उस दौरान 117 नर कंकाल, दो ताम्र निर्मित एंटीना सोल्ड तलवार, दो ढाल, शवों को जलाने की भट्टी, गले का हार, सोने के चार कंगन, सैकड़ों की संख्या में बहुमूल्य मनके मिले थे। तभी से माना जा रहा है कि सिनौली की जमीन से प्राचीन भारत का इतिहास सामने आएगा। साल 2018 में खुदाई हुई तो कब्रों में दफनाए गए शवों के अवशेष, तीन ताबूत मिले थे। जिससे 'शाही कब्रगाह' होने का अंदाजा लगाया गया था। इसके अलावा कुछ 'योद्धाओ' के तीन रथ लकड़ी के, रथ के उपर तांबे और कांस्य का काम था। लकड़ीओ की टांगों वाले तीन चारपाईनुमा ताबूत मिले, इनपर तांबे के पीपल के पत्ते के आकार की सजावट थी। इसके अलावा तांबे के चार एंटिना (स्पर्श सुत्र), तलवारें, सात सुरंगनुमा चीजें, दो खंजर, तीन तांबे के कटोरे और एक शिरस्त्राण मिला था।

add more * . गुरु गोरखनाथ का इस स्थान पर आगमन और तप करना - आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व गुरु गोरखनाथ जी ने उज्जैन से चलकर इस स्थान पर अपना धूना रमाया और तप किया । उसी स्थान पर गुरु गोरखनाथ जी का धूना रहा है । जिसका प्रमाण छपरौली में आज भी नागा महात्माओं का मठ है । यह भूमि नागा महात्माओं की तपोभूमि रही है । जिस स्थान पर यह मन्दिर है पौराणिक काल से ही लोग इस स्थान पर चूरमा और दूध गुरु गोरखनाथ जी एवं गोगावीर जहारवीर के नाम से चढाते आ रहे हैं । अत : यह सिद्ध पीठ भगवान श्रीकृष्ण जी की कर्म भूमि , महात्मा विदुर व गुरु गोरखनाथ और नागा महात्माओं की तपोभूमि है तथा भगवान वेदव्यास की साधना स्थली है यह भूमि उपरोक्त योगीयो के आशिस् से सदैव परिपूर्ण रहेगी और उनकी शक्ति यहाँ हमेशा विराजमान रहेगी ।

* . श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ - वेदव्यास धर्म पीठ का निर्माण- जहां पर श्री कृष्णातीर्थ भगवन ने दर्शन दिए थे महाप्रभु जी ने यह भूमि ऋषिपाल पुत्र श्री विष्णी निवासी ग्राम बदरखा से खरीद ली और उसमें श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ मन्दिर का निर्माण शुरू किया । 4 अक्टूबर 2001 तिथि दौज को महाप्रभु जी ने काली खोली धाम मिलकपुर, भिवाड़ी राजस्थान से ज्योति लाकर यहाँ पर बाबा मोहन राम जी की ज्योति विराजमान की जिस से ज्योति में बाबा मोहनराम जी की पूर्ण शक्तियाँ विराजमान हो गये है और यह भूमि देवभूमि हो गई एवं यह धाम देवभूमि पावनधाम कृष्णतीर्थ हलालपुर कहलाने लगा । धीरे - धीरे बाबा मोहन राम मन्दिर की ख्याति चारों दिशाओं में फैलती चली गई और दूर - दूर से लोग हर पन्द्रहवें दिन तिथि दौज में यहाँ आने लगे । सभी दुखियों के दुख दूर होने लगे । इसके मानने वाले चारों दिशाओं में देश - विदेश में हो गये | यहाँ पर महाप्रभु जी सिंहासन से आशिस् देते हैं उसके दैविक , दैहिक और भौतिक तीनों प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं । सभी धर्मों के लोग इस मन्दिर में आते हैं तथा अपनी मन्नते मांगते हैं । महाप्रभु जी जाति - पाति , धर्म , भेद भाव आदि से ऊपर उठकर समाज की सेवा में लगे हुए हैं । उनका मानना है कि सभी जीव एक ईश्वर की संतान है । सभी जीवों के प्रति अहिंसा ही संसार में उच्च कोटि का धर्म है तथा मानव सेवा ही सच्ची ईश्वरीय सेवा है ।